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आरबीआई की नई फॉरेक्स स्वैप सुविधा से बैंकिंग शेयरों में आई तेजी। पीएसयू बैंकों ने किया शानदार प्रदर्शन, जबकि एचडीएफसी बैंक गवर्नेंस चिंताओं के कारण पीछे रहा।
मंगलवार का दिन भारतीय शेयर बाजार के लिए बैंकिंग सेक्टर के नाम रहा। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा अपनी रियायती फॉरेक्स स्वैप सुविधा (concessional forex swap facility) के लिए परिचालन दिशा-निर्देश जारी करने के बाद बैंकिंग शेयरों में जबरदस्त खरीदारी देखी गई। इसका सीधा असर निफ्टी बैंक इंडेक्स पर दिखा, जो दोपहर के कारोबार में 1.77% यानी 954.75 अंक की छलांग लगाकर 55,018.50 के स्तर पर पहुंच गया। यह बढ़त बेंचमार्क निफ्टी 50 के मुकाबले कहीं अधिक प्रभावशाली थी। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSU Banks) ने इस रैली का नेतृत्व किया, जबकि अधिकांश निजी बैंक भी मजबूती के साथ कारोबार करते दिखे।
आरबीआई की नई सुविधा और इसका प्रभाव
बैंकिंग क्षेत्र में इस उत्साह का मुख्य कारण आरबीआई द्वारा ‘फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट’ (FCNR-B) जमाओं के लिए जारी की गई विशेष यूएस डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा है। इस योजना के तहत, बैंक 30 सितंबर 2026 तक तीन से पांच साल की अवधि के लिए ताजा FCNR(B) जमा जुटा सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्रीय बैंक ने इन जमाओं को ‘कैश रिजर्व रेशियो’ (CRR) और ‘स्टैच्यूरी लिक्विडिटी रेशियो’ (SLR) की अनिवार्यताओं से छूट दी है। इस छूट से बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा संसाधन जुटाने की लागत काफी कम हो जाएगी।
यह कदम आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा द्वारा पिछले सप्ताह घोषित उस पैकेज का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के बीच विदेशी पूंजी के प्रवाह को समर्थन देना है। बाजार के जानकारों के अनुसार, यह कदम बैंकिंग प्रणाली में 25 से 70 बिलियन डॉलर तक का अतिरिक्त विदेशी पूंजी प्रवाह ला सकता है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज का मानना है कि यह पहल बैंकों की देनदारियों (liability profiles) को सुधारने में मदद करेगी और घरेलू जमा जुटाने पर निर्भरता को कम करेगी।
बैंकों के लिए जमा जुटाने की चुनौती का समाधान
भारतीय बैंक पिछले कुछ समय से जमा राशि (deposits) जुटाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं। खुदरा निवेशक अपनी बचत को शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और अन्य वित्तीय संपत्तियों में निवेश करना पसंद कर रहे हैं, जिससे बैंकों के लिए फंड जुटाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। आरबीआई के इस फैसले से बैंकों को कम नियामक लागत पर स्थिर फंडिंग का एक वैकल्पिक स्रोत मिल गया है। CRR और SLR की छूट का लाभ बैंकों को तब तक मिलता रहेगा, जब तक कि वह मूल जमा राशि उनके बही-खातों में बनी रहेगी।
कौन से बैंक रहे सबसे आगे?
इस रैली में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बाजी मार ली। बैंक ऑफ बड़ौदा के शेयरों में 5% से अधिक का उछाल आया, जबकि पंजाब नेशनल बैंक, केनरा बैंक और फेडरल बैंक में 3% से अधिक की तेजी दर्ज की गई। वहीं, प्रमुख निजी बैंकों में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) 2.22%, आईसीआईसीआई बैंक 1.94% और एक्सिस बैंक 1.62% चढ़कर बंद हुए।
एचडीएफसी बैंक के पिछड़ने का कारण
बैंकिंग क्षेत्र में आई चौतरफा तेजी के बीच एचडीएफसी बैंक एकमात्र ऐसा बड़ा शेयर था, जो लाल निशान में कारोबार कर रहा था। निवेशकों की सतर्कता का मुख्य कारण बैंक में चल रही आंतरिक समीक्षा है। यह समीक्षा मार्च में पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती के इस्तीफे के बाद शुरू की गई थी। खबरों के अनुसार, अतानु चक्रवर्ती ने अपने इस्तीफे पत्र में गवर्नेंस से जुड़ी कुछ चिंताएं जाहिर की थीं, जिसकी जांच के लिए त्रिलेगल (Trilegal) और वाडिया गांधी एंड कंपनी जैसे कानून फर्मों को नियुक्त किया गया है।
इस जांच रिपोर्ट के इस सप्ताह बैंक के बोर्ड को सौंपे जाने की संभावना है। निवेशकों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि क्या यह रिपोर्ट मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ शशिधर जगदीशन की पुनर्नियुक्ति पर कोई असर डालेगी, जिनका वर्तमान कार्यकाल अक्टूबर में समाप्त होने वाला है। गवर्नेंस से जुड़ी अनिश्चितताओं के चलते निवेशक इस शेयर को लेकर अभी ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में हैं।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
आरबीआई की यह पहल निश्चित रूप से बैंकिंग प्रणाली की तरलता (liquidity) को बढ़ाने और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती देने वाली है। बैंकों के लिए कम लागत पर डॉलर जमा प्राप्त करना उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है। जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सरकारी समर्थन और नीतियों का लाभ उठाते हुए नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं, वहीं निजी क्षेत्र के दिग्गजों में एचडीएफसी बैंक जैसी कंपनियों के लिए गवर्नेंस संबंधी स्पष्टता बहुत जरूरी है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विदेशी पूंजी का यह संभावित प्रवाह बाजार में कितनी स्थिरता लाता है। निवेशकों के लिए, यह समय बैंकिंग क्षेत्र में एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का है। जहाँ फंडामेंटल रूप से मजबूत बैंक इस नई सुविधा का लाभ उठाकर विकास करेंगे, वहीं गवर्नेंस के मुद्दों से घिरे संस्थानों पर नजर रखना भी उतना ही अनिवार्य है। अंततः, भारतीय बैंकिंग प्रणाली की मजबूती ही भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को बनाए रखने की मुख्य चाबी है।