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भारी उद्योग मंत्रालय राजेश एक्सपोर्ट्स को पीएलआई स्कीम से हटाने पर विचार कर रहा है। सेबी की जांच में सामने आए गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप।
भारतीय कॉर्पोरेट जगत में एक बड़ी हलचल मच गई है, जहां भारी उद्योग मंत्रालय (Ministry of Heavy Industries) स्वर्ण आभूषण क्षेत्र की दिग्गज कंपनी ‘राजेश एक्सपोर्ट्स’ को सरकार की महत्वाकांक्षी ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ (PLI) योजना से बाहर करने की योजना बना रही है। यह निर्णय भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा कंपनी के खिलाफ लगाए गए गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बाद लिया जा रहा है। सेबी का आरोप है कि कंपनी ने न केवल वित्तीय धोखाधड़ी की है, बल्कि अपने बढ़े हुए राजस्व (inflated revenues) को सही ठहराने के लिए आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए हैं। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, इस संबंध में अंतिम निर्णय भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी द्वारा लिया जाएगा।
सेबी की जांच और कंपनी पर लगे गंभीर आरोप
सेबी ने इस मामले में कठोर रुख अपनाते हुए कंपनी के प्रमोटर और सीईओ राजेश मेहता को अगले आदेश तक कंपनी की प्रतिभूतियों (securities) में व्यापार करने से रोक दिया है और मामले की नए सिरे से फोरेंसिक ऑडिट करने का आदेश दिया है। विवाद का मुख्य केंद्र कंपनी के समेकित वित्तीय विवरण (consolidated financial statements) हैं। निवेशक अक्सर राजेश एक्सपोर्ट्स की सालाना रिपोर्ट देखकर चकित रह जाते थे, जिसमें कंपनी हर साल लाखों करोड़ रुपये का वैश्विक कारोबार दिखाती थी। हालांकि, सेबी की जांच में यह खुलासा हुआ कि इस विशाल राजस्व का 97% से 99% हिस्सा विदेशों में स्थित सहायक कंपनियों, विशेष रूप से स्विट्जरलैंड स्थित ‘वालकैम्बी एसए’ (Valcambi SA) से आता था। सेबी का कहना है कि इन राजस्वों को पुष्ट करने वाले रिकॉर्ड या तो सार्वजनिक नहीं किए गए या उनका स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं किया जा सका।
“राजस्व में हेराफेरी”: सेबी का सख्त रुख
सेबी ने अपने अंतरिम आदेश में कहा है कि कंपनी द्वारा दिखाया गया 97% से 99% राजस्व प्रथम दृष्टया ‘बढ़ा-चढ़ाकर’ दिखाया गया है, जो कि अत्यंत गंभीर और अप्रत्याशित मामला है। जांच के अनुसार, कंपनी ने अपने समूह के पैमाने और वित्तीय स्वास्थ्य को बेहतर दिखाने के लिए राजस्व में हेराफेरी की। सेबी का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच सहायक कंपनियों के माध्यम से दिखाए गए लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व को गलत तरीके से पेश किया गया है। कंपनी पर आरोप है कि उसने ऑडिट के दौरान पूरी खाता बही, ईआरपी (ERP) एक्सेस, जर्नल एंट्रीज और सहायक दस्तावेज प्रदान करने में विफलता दिखाई है। फोरेंसिक ऑडिटर भी लेनदेन के केवल एक छोटे से हिस्से को ही सत्यापित कर सके, क्योंकि महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
पीएलआई (PLI) स्कीम और भविष्य पर संकट
राजेश एक्सपोर्ट्स को एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी स्टोरेज के लिए सरकार की पीएलआई स्कीम के तहत लाभार्थी के रूप में चुना गया था। अब इस विवाद के बाद कंपनी के लिए पीएलआई का लाभ उठाना मुश्किल हो सकता है। यह योजना भारत में बैटरी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है, जिसके अन्य लाभार्थियों में रिलायंस न्यू एनर्जी सोलर, ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, हुंडई ग्लोबल मोटर्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, अमारा राजा बैटरीज, इंडिया पावर कॉरपोरेशन, लार्सन एंड टुब्रो और एक्साइड इंडस्ट्रीज जैसे बड़े नाम शामिल हैं। यदि राजेश एक्सपोर्ट्स को इस सूची से हटाया जाता है, तो यह कंपनी के विस्तार और विश्वसनीयता के लिए एक बड़ा झटका होगा।
क्या अब निवेशक और सरकार का भरोसा कायम रहेगा?
राजेश एक्सपोर्ट्स का मामला कॉरपोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) के महत्व को रेखांकित करता है। जब कोई कंपनी अपनी आय का बड़ा हिस्सा विदेशों से दिखाती है और उसका सत्यापन पारदर्शी तरीके से नहीं हो पाता, तो यह निवेशकों के विश्वास को कमजोर करता है। सेबी की कार्रवाई यह संदेश देती है कि नियामक अब वित्तीय विवरणों की बारीकी से जांच कर रहे हैं और किसी भी प्रकार की अनियमितता को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार के लिए भी यह एक चुनौती है कि पीएलआई जैसी योजनाओं के लाभार्थियों का चयन करते समय उनकी वित्तीय साख की जांच अधिक कठोरता से की जाए।
आने वाले दिनों में एचडी कुमारस्वामी द्वारा लिया जाने वाला निर्णय न केवल राजेश एक्सपोर्ट्स के भविष्य को तय करेगा, बल्कि यह अन्य कंपनियों के लिए भी एक सबक होगा। यदि कंपनी अपने दावों को साबित नहीं कर पाती, तो सरकार का उसे पीएलआई योजना से बाहर करना तय है। इस पूरे प्रकरण ने बाजार में यह बहस छेड़ दी है कि क्या कंपनियों को केवल बड़े राजस्व आंकड़ों के आधार पर ही सरकारी प्रोत्साहन मिलने चाहिए, या फिर उनके पीछे की वित्तीय प्रक्रियाओं की भी गहराई से जांच होनी चाहिए। फिलहाल, पूरी इंडस्ट्री और निवेशक वर्ग इस मामले में सेबी की अंतिम रिपोर्ट और मंत्रालय के फैसले पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं।