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शारदीय नवरात्रि 2025 में कल्पारंभ पूजा का महत्व क्या है? जानें अकाल बोधन की विधि, धार्मिक मान्यता और किन राज्यों में यह परंपरा विशेष रूप से निभाई जाती है।
शारदीय नवरात्रि में की जाने वाली “कल्पारंभ पूजा” को लेकर उत्तर और पूर्व भारत में गहरी आस्था जुड़ी है। 22 सितंबर 2025 से शुरू हुई शारदीय नवरात्रि में षष्ठी तिथि को “कल्पारंभ” या “अकाल बोधन” की विशेष पूजा की जाती है, खासकर पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में।
यह पूजा मां दुर्गा को समय से पहले जगाने और शक्ति के रूप में आमंत्रित करने का प्रतीक मानी जाती है। आइए जानें, कल्पारंभ का महत्व और इसकी संपूर्ण पूजा विधि।
कल्पारंभ क्या है?
कल्पारंभ यानी “शुभ आरंभ”, नवरात्रि के षष्ठी तिथि पर की जाने वाली एक विशेष पूजा प्रक्रिया है, जिसे ‘अकाल बोधन’ भी कहा जाता है। यह पूजा देवी दुर्गा का दक्षिणायन काल में जागरण है, जब देवी-देवता योगनिद्रा में होते हैं।
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इस समय देवी दुर्गा का पूजन अत्यधिक शुभ और फलदायी माना जाता है। यह नवरात्रि में आध्यात्मिक ऊर्जा और देवी कृपा प्राप्त करने का पहला और महत्वपूर्ण चरण होता है।
कल्पारंभ पूजा विधि
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प्रातःकाल स्नान करके पूजा का संकल्प लें।
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एक शुद्ध कलश में जल भरें, और उसे बेल (बिल्व) वृक्ष के नीचे रखें – इसे बिल्व निमंत्रण कहते हैं।
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पूजा स्थल पर कलश स्थापना के साथ देवी का आह्वान करें।
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संध्याकाल में ‘अकाल बोधन’ होता है – सूर्यास्त से ढाई घंटे पूर्व माता को मंत्रों द्वारा जाग्रत किया जाता है।
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मां की पूजा, आरती और प्रसाद वितरण के साथ दिन का समापन होता है।
कहां और कैसे मनाया जाता है कल्पारंभ?
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पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की शुरुआत षष्ठी से होती है, और इसी दिन से मां का स्वागत किया जाता है।
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धुनुची नृत्य, सिंदूर खेला, कोलाबोऊ स्नान जैसे पारंपरिक उत्सव इस पूजा का हिस्सा हैं।
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यह पर्व षष्ठी से नवमी तक विशेष पूजा और उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
धार्मिक मान्यता और लाभ
कल्पारंभ को मां महाकाली की उपासना का सर्वोत्तम समय माना जाता है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक पूजा करते हैं, उन्हें देवी की अखंड कृपा और रक्षा वर्ष भर प्राप्त होती है। घर में सकारात्मक ऊर्जा, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति बनी रहती है।