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पुष्कर स्नान का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, खासकर देवउठनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक। इन दिनों का महत्व इतना अधिक है कि इन बिना चारधाम यात्रा भी अधूरी मानी जाती है। पुष्कर धाम की पौराणिक कथा और धार्मिक महत्ता को समझते हुए जानिए इसके महत्व को विस्तार से।
पुष्कर स्नान का महत्व
पुष्कर स्नान को लेकर मान्यता है कि यह विशेष रूप से चारधाम यात्रा के पुण्य फल को पूरा करता है। देवउठनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक, इन पांच दिनों में किए गए पुष्कर स्नान का महत्व अत्यधिक है। इन दिनों को भीष्म पंचक कहा जाता है, और कार्तिक पूर्णिमा के दिन इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
यह माना जाता है कि, बिना पुष्कर स्नान किए चारधाम यात्रा का पुण्य अधूरा रह जाता है, इसलिए भक्तगण इस दौरान पुष्कर धाम का दर्शन और स्नान करते हैं, जिससे उनका धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण होता है।
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पुष्कर से जुड़ी पौराणिक कथा
पुष्कर धाम से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जिसके अनुसार, ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर यज्ञ करने का संकल्प लिया। उस समय पृथ्वी लोक पर एक असुर वज्रनाभ का आतंक था, जो बच्चों को जन्म के बाद ही मार डालता था। इस असुर की आतंकित कर देने वाली खबर ब्रह्मलोक तक पहुंची, जिसके बाद ब्रह्मा जी ने वज्रनाभ का अंत करने का निश्चय किया।
ब्रह्मा जी ने अपने कमल पुष्प से असुर पर प्रहार किया, और उसका अंत किया। इस प्रहार से गिरा हुआ पुष्प एक विशाल सरोवर का रूप धारण कर लिया, जो बाद में “पुष्कर सरोवर” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस सरोवर के पानी में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है, और यह स्थान एक प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया।
पुष्कर यात्रा का संपूर्ण फल प्राप्ति
पुष्कर यात्रा का पूरा पुण्य तभी प्राप्त होता है, जब भक्त अगस्त्य कुंड में स्नान करते हैं, जो यज्ञ पर्वत के पास स्थित है। यहां किया गया जप, तप, और पूजा का फल अक्षय माना जाता है। विशेषकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक इस यात्रा का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
पुष्कर मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल
पुष्कर में ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर स्थित है, जो देशभर में प्रसिद्ध है। पुष्कर के 52 घाटों के आसपास फैला हुआ यह तीर्थ स्थल धार्मिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। पुष्कर सरोवर के तीन भाग हैं – ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर, और कनिष्ठ पुष्कर। प्रत्येक पुष्कर के स्वामी भी अलग-अलग हैं – ज्येष्ठ पुष्कर के स्वामी ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के स्वामी श्री विष्णु, और कनिष्ठ पुष्कर के स्वामी रुद्र हैं।
पुष्कर मंदिर के पुजारी गुर्जर समुदाय से आते हैं, जिन्हें भोगा के नाम से जाना जाता है।