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काशी की प्राचीन नगरी में स्थित मणिकर्णिका घाट हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थल है। यह घाट केवल जीवन का उत्सव नहीं बल्कि मृत्यु के महत्व को दर्शाता है। यहां लोग व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं बल्कि आत्मिक शांति और मोक्ष की कामना लेकर आते हैं।
मणिकर्णिका घाट में मृत्यु का महत्व
काशी खंड और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने से आत्मा जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होती है। इसे मोक्षदायिनी घाट भी कहा जाता है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस घाट में प्राण त्यागता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाता है। इस घाट की अग्नि कभी नहीं बुझती और इसे ‘अखंड अग्नि’ भी कहा जाता है।
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मणिकर्णिका घाट का इतिहास और कथा
मणिकर्णिका घाट का नाम देवी सती के कान की मणि ‘मणिकर्ण’ से जुड़ा माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां पार्वती का श्राप इस घाट पर सदैव चिताओं की अग्नि जलाता है। यही कारण है कि यह घाट काशी की गंगा तट पर हमेशा जीवंत और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना हुआ है।
विवाद और नवीनीकरण
हाल ही में मणिकर्णिका घाट के नवीनीकरण और पुनर्विकास कार्यों को लेकर विवाद उठे हैं। कुछ मूर्तियों और कलाकृतियों के हटाए जाने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। इन वीडियो को लेकर राजनीतिक बहस और आलोचना जारी है, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में इसे AI-जनरेटेड और फेक बताया गया है।
मणिकर्णिका घाट: मनोकामना नहीं, शांति का स्थल
मणिकर्णिका घाट का महत्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक भी है। यह वह स्थान है जहां लोग सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि आत्मिक शांति और मोक्ष के लिए आते हैं। काशी की यह पहचान, इसकी संस्कृति और परंपरा को जीवित रखती है।