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मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक महत्वपूर्ण स्थल है, जहां भगवान शिव का अद्वितीय श्रृंगार किया जाता है। महाकाल मंदिर की भस्म आरती यहां की विशेष पहचान है, जो न केवल भक्तों के बीच श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह जीवन के सबसे बड़े सत्य—मृत्यु के बारे में भी हमें सिखाती है।
महाकालेश्वर मंदिर: 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे खास
महाकालेश्वर मंदिर एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जहां भगवान शिव का ऐसा विशेष श्रृंगार किया जाता है। अन्य सभी ज्योतिर्लिंगों की तुलना में महाकाल मंदिर में भस्म आरती का आयोजन अनोखा है, जो भगवान शिव को अर्पित की जाती है। इसे भगवान शिव की प्रिय आरती माना जाता है और इसे धार्मिक मान्यता भी प्राप्त है।
भस्म आरती का धार्मिक रहस्य और मान्यता
भस्म आरती के पीछे एक गहरी धार्मिक मान्यता छिपी हुई है। वैराग्य और मृत्यु को जीवन का अंतिम सच माना गया है, और यह भाव भस्म आरती के माध्यम से भक्तों तक पहुंचता है। भगवान शिव को काल का नियंत्रक माना जाता है, जो इस संसार की अस्थिरता और क्षणिकता को दर्शाता है। भस्म का अर्थ यह है कि हर वस्तु का अंत निश्चित है और सब कुछ एक दिन राख में मिल जाएगा।
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भगवान शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करके हमें यह बताते हैं कि भौतिक सुख और सामग्री स्थायी नहीं होते, जबकि आत्मा अमर रहती है। भस्म आरती ब्रह्म मुहूर्त में संपन्न होती है, जब महाकाल अपने निराकार रूप में विराजमान होते हैं। इस दिव्य स्वरूप के दर्शन से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है, और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
भस्म का महत्व: सांसारिक इच्छाओं का त्याग
भस्म आरती व्यक्ति को जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्रदान करती है। पहले महाकाल मंदिर में भगवान शिव का श्रृंगार श्मशान घाट से लाए गए भस्म से किया जाता था। यह भस्म पंचतत्वों में विलीन हुए शरीर की राख होती थी, जो शिव को समर्पित की जाती थी।
हालांकि, वर्तमान में गाय के गोबर और चंदन से बनी भस्म का उपयोग किया जाता है। यह भस्म शुद्ध मानी जाती है, जो न केवल जीवन से नकारात्मकता को दूर करती है, बल्कि सांसारिक वस्तुओं और इच्छाओं के त्याग का प्रतीक भी है।