भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अधूरी क्यों रह गई? इससे जुड़ी रोचक कहानी पढ़ें

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अधूरी क्यों रह गई? इससे जुड़ी रोचक कहानी पढ़ें

भगवान जगन्नाथ: जगन्नाथ पूरी हिंदू धर्म के मुख्य धामों में से एक है। आज हम आपको एक रोचक कहानी बताएंगे कि जगन्नाथ जी की मूर्ति अधूरी क्यों है।

भगवान जगन्नाथ: हिंदू धर्म में चार महत्वपूर्ण धामों में से एक जगन्नाथ पुरी धाम है। भगवान जगन्नाथ पुरी धाम में अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। पुरी में होने वाली जगन्नाथ यात्रा में हर साल लाखों लोग भाग लेते हैं। माना जाता है कि जगन्नाथ पुरी यात्रा करने से सभी पाप धुल जाते हैं। इस पवित्र मंदिर में जगन्नाथ जी की मूर्ति अधूरी है, और इसके अधूरे रहने की एक रोचक कहानी है। आज हम इसी विषय पर अधिक जानकारी देंगे।

कैसे जगन्नाथ भगवान की मूर्ति अधूरी रह गई?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पांडवों ने भगवान कृष्ण का दाह संस्कार किया जब उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया था। शरीर जल गया, लेकिन उनका हृदय बचा रहा। पांडवों ने भगवान कृष्ण का दिल जल में बहाया। राजा इंद्रदयुम्न ने भगवान कृष्ण का दिल पाया और उसे भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में डाल दिया। जिस मूर्ति में भगवान जगन्नाथ का हृदय विराजित है, उसे बनाने का काम राजा ने विश्वकर्मा को दिया, जो एक बूढ़े बढ़ई की तरह दिखता था। विश्वकर्मा ने राजा की बात मान ली, लेकिन एक शर्त भी रखी। विश्वकर्मा ने कहा कि मूर्तियों को बनाने का काम तब तक पूरा नहीं होगा और अगर कोई अंदर आया तो मैं मूर्तियों को बनाने का काम छोड़ दूंगा। राजा ने विश्वकर्मा की बात स्वीकार की।

इसके बाद विश्वकर्मा मूर्तियों को बनाने लगे। मूर्तियों को बनाते समय राजा दरवाजे से आवाजें सुनते रहते थे। आपको बता दें कि विश्वकर्मा ने जगन्नाथ जी के अलावा भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्ति बनाई थीं। दरवाजे के बाहर से आवाजें सुनकर राजा संतुष्ट हो गए कि मूर्तिकला अंदर चल रही है। लेकिन एक दिन आवाजें अचानक बंद हो गईं। राजा को लगता था कि मूर्ति बनाना अब पूरा हो गया है। राजा ने गलतफहमी में दरवाजा खोला और विश्वकर्मा वहाँ से भाग गए। उसके बाद जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं का निर्माण नहीं हुआ। तब से ये चित्र अपूर्ण रहे हैं।

2024 में जगन्नाथ दर्शन

2024 में 7 जुलाई से जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू होगी। 16 जुलाई तक चलने वाली रथयात्रा में जगन्नाथ जी अपने भाई और बहने के साथ अपनी माता मौसी गुंडिचा के घर जाएंगे। रथयात्रा की परंपरा बहुत पुरानी है और आज भी पूरे विधि विधान से की जाती है।

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