राजस्थान में खेजड़ी संरक्षण आंदोलन तेज, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कानून का आश्वासन दिया; बीकानेर, हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में आंदोलन जारी।
राजस्थान में खेजड़ी पेड़ों के संरक्षण को लेकर चल रहे आंदोलन ने राज्य में नई ऊँचाइयाँ छू ली हैं। बीकानेर से शुरू हुआ यह आंदोलन अब हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर और जालोर जैसे जिलों तक फैल चुका है। ग्रामीणों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और बिश्नोई समुदाय के सदस्यों ने खेजड़ी के संरक्षण की मांग को लेकर प्रदर्शन और आमरण अनशन जारी रखा है।
खेजड़ी (Prosopis cineraria) को राज्य का प्रतीक-पेड़ माना जाता है और यह थार मरुस्थल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आंदोलन में संत और ग्रामीण महिलाएँ भी सक्रिय रूप से शामिल हैं, जो लंबे समय से महापड़ाव और अनशन कर रहे हैं।
कलश यात्रा और आंदोलन का विस्तार
बीकानेर में आंदोलन के हिस्से के रूप में कलश यात्रा का आयोजन किया गया। इसमें युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं ने भाग लिया और पारंपरिक गीत गाकर खेजड़ी के पारिस्थितिक महत्व को उजागर किया। इससे आंदोलन एक स्थानीय मुद्दे से राज्यव्यापी जनआंदोलन में बदल गया।
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मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का आश्वासन
आंदोलन के प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से जयपुर में मुलाकात की और कड़े संरक्षण कानून की मांग की। मुख्यमंत्री ने खेजड़ी संरक्षण कानून (Khejri Conservation Act) लाने का आश्वासन दिया। इस कानून में पेड़ों की कटाई पर रोक और दीर्घकालिक संरक्षण की व्यवस्था शामिल होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार पर्यावरण संतुलन और स्थानीय समुदायों की भावनाओं को नुकसान नहीं होने देगी।
आंदोलन की प्रमुख मांगें
आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें हैं:
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खेजड़ी और अन्य पारंपरिक पेड़ों की कटाई रोकना
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मजबूत और सख्त कानून बनाना जो पेड़ों को दीर्घकालीन सुरक्षा दे
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पहले काटे गए पेड़ों की जगह रोपण और पुनरुद्धार योजना लागू करना
आंदोलनकारियों का मानना है कि बिना योजना के पेड़ों की कटाई न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और परंपरा के अनुसार भी उचित नहीं है।
आंदोलन का प्रभाव
बीकानेर में आंदोलन के चलते बाजार बंद और स्कूलों में छुट्टियां जैसी स्थिति देखने को मिली। कई स्थानीय नेताओं ने सरकार से जन की मांगों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की। विरोधी पक्ष ने आरोप लगाया कि खेजड़ी कटाई में सौर ऊर्जा परियोजनाओं और राजनीतिक दबाव का भी हाथ है।
आगे की राह
आंदोलन समिति ने कहा कि सरकार के प्रस्ताव के आधार पर आंदोलन जारी रखने या वापस लेने का निर्णय लिया जाएगा। कई संतों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन और अधिक तीव्र रूप ले सकता है।